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25/08/21

आंदोलन

गांधी काल के प्रमुख आंदोलन:-


खिलाफत आंदोलन:

 खिलाफत आंदोलन की शुरुआत एक संप्रदायिक आंदोलन के रूप में हुई थी। इसका उद्देश्‍य तुर्की के खलीफा के समर्थन में उनके साम्राज्‍य को बचाने के लिये ब्रिटेन एवं अन्‍य यूरोपीय शक्तियों का विरोध करना था। खिलाफत आंदोलन का प्रमुख कारण प्रथम विश्‍व युद्ध में तुर्की की हार थी। सेवरेस संधि (1920) के कड़े प्रतिबन्‍ध मुस्लिमों के लिये बहुत अपमान की बात थी। भारत में मुसलमान अंग्रेजों के तुर्की के खिलाफ व्‍यवहार से नाखुश थे और इसलिये उन्‍होने खिलाफत आंदोलन की शुरुआत की थी। अली भाईयों मुहम्‍मद अली और शौकत अली, मौलाना अबुल कलाम आजाद और डा. एम. अंसारी ने अन्‍य के साथ मिलकर खिलाफत आंदोलन की शुरुआत की। 17 अक्‍टूबर 1919 का दिन खिलाफत दिवस के रूप में मनाया गया। इस दिन हिन्‍दुओं ने मुसलमानों के साथ अनशन किया और देश भर में हड़़ताल की। 1920 में खिलाफत आंदोलन का असहयेाग आंदोलन में विलय कर लिया गया।

असहयोग आंदोलन:

 महात्‍मा गांधी के नेतृत्‍व में भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस ने 1 अगस्‍त 1920 को असहयोग आंदोलन के रूप में विरोध का नवीन तरीका अपनाया। सभी उपाधियों, मनो‍नीत कार्यालयों और पदों का त्‍याग कर दिया गया। ब्रिटिश न्‍यायालय, कार्यालय और सभी प्रकार के सरकारी शैक्षिक संस्‍थानों का बहिष्‍कार किया गया।

चौरी चौरा घटना (1922):

 असहयोग आंदोलन के दौरान कुछ पुलिसवालों द्वारा उकसाये जाने पर, भीड़ के एक समूह ने उनपर हमला किया। पुलिस ने उनपर खुलेआम गोलियाँ बरसायीं। जवाब में, पूरे घटनाक्रम में 22 पुलिसवाले मारे गये और थाने में आग लगा दी। इसे स्‍तब्‍ध होकर गांधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन:

 सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1930 में महात्‍मा गांधी के नेतृत्‍व में दांडी नमक यात्रा में नमक कानून तोड़ने के साथ शुरु हुई।

दांडी यात्रा (नमक सत्‍याग्रह) की शुरुआत साबरमती आश्रम से गुजरात में दांडी नामक स्‍थान पर पहुँच कर पूरी हुई। इसके बाद देश में काफी विरोध प्रदर्शन हुए। इसके कारण ब्रिटिश सरकार नाराज हो गयी जिसके परिणामस्‍वरूप जवाहर लाल नेहरू और महात्‍मा गांधी को जेल में डाल दिया गया। मार्च 1931 को, गांधी जी ने वायसराय लार्ड इरविन के साथ आंदोलन समाप्‍त करने के लिये गांधी इरविन समझौते पर हस्‍ताक्षर किये जो कि अन्‍तत: 7 अप्रैल 1934 को समाप्‍त हुआ।

व्‍यक्तिगत सत्‍याग्रह आंदोलन (अगस्‍त 1940):

 महात्‍मा गांधी ने व्‍यक्तिगत सत्‍याग्रह आंदोलन की शुरुआत की। यह सीमित, प्रतीकात्‍मक और अहिंसक प्रकृति का आंदोलन था। आचार्य विनोबा भावे प्रथम सत्‍याग्रही थे और उन्‍हें तीन महीने के कारावास की सजा दी गई थी। जवाहर लाल नेहरू दूसरे सत्‍याग्रही थे और उन्‍हें चार महीने के कारावास की सजा दी गई थी। व्‍यक्तिगत सत्‍याग्रह लगभग 15 महीनों तक जारी रहा।

भारत छोड़ो आंदोलन:

 भारत छोड़ो आंदोलन, इसे अगस्‍त आंदोलन भी कहते हैं, की शुरुआत 8 अगस्‍त 1942 को हुई थी। सर स्‍टेफोर्ड क्रिप्‍स की वापसी के खिलाफ गांधी जी का विरोध इसका कारण था। वह इस आंदोलन के माध्‍यम से भारत की स्‍वतन्‍त्रता के लिये ब्रिटिश सरकार के साथ विचार-विमर्श करना चाहते थे। इस दौरान उन्‍होने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। 9 अगस्‍त को कांग्रेस के कई नेताओं जैसे अबुल कलाम आजाद, वल्‍लभ भाई पटेल, महात्‍मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू को गिरफ्तार कर लिया गया। आंदोलन को चार भागों में बांटा जा सकता है:

भारत छोड़ो आंदोलन के पहले चरण में जुलूस, हड़ताल और प्रदर्शन हुए।
दूसरे चरण में सरकारी इमारतों और नगर निगम घरों पर छापे डाले गये। इसके साथ ही, पोस्‍ट ऑफिस, रेलवे स्‍टेशन और पुलिस थानेां में आग लगा दी गई।
भारत छोड़ो आंदोलन के तीसरे चरण का आरंभ सितम्‍बर 1942 में हुआ। भीड़ ने बंबई, उत्‍तर प्रदेश और मध्‍य प्रदेश में कई जगहों पर बमबारी की।
धीमे धीमे आंदोलन ने शांतिपूर्ण रूप ले लिया और यह मई 1944 में महात्‍मा गांधी की रिहाई तक जारी रहा। यह आंदोलन का चौथा चरण था।
भारतीय स्‍वतन्‍त्रता संघर्ष के अन्‍य महत्वपूर्ण घटनाक्रम:-

होमरूल आंदोलन (1916)

: तिलक के मांडले (बर्मा) जेल से छह साल बाद रिहाई के बाद तिलक और श्रीमती एनी बेसेंट ने होमरूल आंदोलन की शुरुआत की। दोनों ने मार्ले-मिंटो सुधार और प्रथम विश्‍व युद्ध के समय की ज्‍यादतियों के विरोध तथा कुछ रियायतें प्राप्‍त करने के लिये साथ में मिलकर आंदोलन करने का निर्णय किया।

रॉलेट एक्‍ट (मार्च 1919):

 इस अधिनियम के अनुसार, किसी भी व्‍यक्ति को संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया जा सकता है। ऐसी गिरफ्तारी के खिलाफ कोई भी सुनवाई अथवा याचिका दाखिल नहीं की जा सकती है। इस अधिनियम को काला अधिनियम कहा गया और इसका व्‍यापक विरोध किया गया था।

जलियाँवाला बाग हत्‍याकांड (13 अप्रैल 1919):

 बैशाखी के दिन, जलियाँवाला बाग में रॉलेट सत्‍याग्रह के समर्थन में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया जा रहा था। जनरल डायर ने भी़ड़ पर बिना किसी पूर्व चेतावनी दिये अंधाधुंध गोलीबारी करने का आदेश दिया था। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार घटना में 379 लोग मारे गये और 1137 लोग जख्‍मी हुए थे।

स्‍वराज पार्टी (जनवरी, 1923):

 असहयोग आंदोलन के स्‍थगन के पश्‍चात कांग्रेस के दिसम्‍बर 1923 गया अधिवेशन में कांग्रेस में विभाजन हो गया। 1 जनवरी 1923 को मोती लाल नेहरू और चितरंजन दास जैसे नेताओं ने कांग्रेस से अलग एक अलग समूह स्‍वराज पार्टी की स्‍थापना की। इसका उद्देश्‍य परिषद चुनाव लड़ना और और सरकार को अंदर से कमजोर करना है।

साइमन कमीशन (नवम्‍बर, 1927):

 ब्रिटिश कंजरवेटिव सरकार द्वारा भारत में भारत शासन अधिनियम, 1919 द्वारा स्‍थापित भारतीय संविधान की कार्यप्रणाली पर रिपोर्ट के लिये सर जॉन साइमन की अध्‍यक्षता में साइमन कमीशन का गठन किया गया था। इसके सातों सदस्‍य अंग्रेज थे। कमीशन में कोई भी भारतीय न होने के कारण इसकी काफी आलोचना की गयी। 30 अक्‍टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के व्‍यापक विरोध प्रदर्शन में लाला लाजपत राय पुलिस द्वारा लाठी चार्ज के दौरान बुरी तरह से घायल हो गये थे और एक महीने बाद उनकी मृत्‍यु हो गयी थी।

पूना समझौता (1932):

 पूना समझौता अछूतों और हिन्‍दुओं के लिये संयुक्‍त निर्वाचक के लिये समझौता था। यह समझौता पुणे में येरावादा जेल में 24 सितम्‍बर 1932 को हुआ था।

क्रिप्‍स मिशन (1942): 

ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों से सहयोग प्राप्‍त करने के अपने निरंतर प्रयासों के तहत 23 मार्च 1942 को सर स्‍टेफोर्ड क्रिप्‍स को भारत भेजा। इसी को क्रिप्‍स मिशन कहते हैं। भारत में प्रमुख राजनैतिक दलों ने क्रिप्‍स प्रस्‍ताव को ठुकरा दिया था। गांधी जी ने क्रिप्‍स प्रस्‍ताव को ‘पोस्‍ट डेटेड चेक’ कहा था।

कैबिनेट मिशन (1946):

 ब्रिटिश कैबिनेट के तीन सदस्‍य पैथिक लारेंस, सर स्‍टेफोर्ड क्रिप्‍स और ए.वी. एलेक्‍जेण्‍डर को स्‍व-शासन के अधिकार और भारतीय संविधान के निर्माण पर सहमति की ऐतिहासिक घोषणा के तहत 15 मार्च 1946 को भारत भेजा गया। इसी को कैबिनेट मिशन कहा जाता है।

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