जस्ट स्वीट
02/05/18
01/05/18
श्रमिक दिवस
हड़ताल के दौरान एक व्यक्ति ने बम फोड़ दिया और प्रदर्शनस्थल पर अफरातफरी मच गई। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने मजदूरों पर गोलियां चलाई। गोलीबारी में कुछ मजदूरों की मौत हो गई, साथ ही कुछ पुलिस अफसर भी मारे गए।. भारत में मजदूर दिवस कामकाजी लोगों के सम्मान में मनाया जाता है। भारत में लेबर किसान पार्टी ऑफ हिन्दुस्तान ने आजादी से पहले 1 मई 1923 को मद्रास में इसकी शुरुआत की थी। उस समय इसे मद्रास दिवस के रूप में मनाया जाता था। इसी दौरान भारत में पहली बार लाल झंडा भी फहराया गया था।
30/04/18
चोल वंश
चोल साम्राज्य சோழர் -------••------- चोल वंश का संस्थापक विजयालय (850-870-71 ई.) पल्लव अधीनता में उरैयुर प्रदेश का शासक था। विजयालय की वंशपरंपरा में लगभस 20 राजा हुए, जिन्होंने कुल मिलाकर चार सौ से अधिक वर्षों तक शासन किया। विजयालय के पश्चात् आदित्य प्रथम (871-907), परातंक प्रथम (907-955) ने क्रमश: शासन किया। परांतक प्रथम ने पांड्य-सिंहल नरेशों की सम्मिलित शक्ति को, पल्लवों, बाणों, बैडुंबों के अतिरिक्त राष्ट्रकूट कृष्ण दि्वतीय को भी पराजित किया। चोल शक्ति एव साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक परांतक ही था। उसने लंकापति उदय (945-53) के समय सिंहल पर भी एक असफल आक्रमण किया। परांतक अपने अंतमि दिनों में राष्ट्रकूट सम्राट् कृष्ण तृतीय द्वारा 949 ई. में बड़ी बुरी तरह पराजित हुआ। इस पराजय के फलस्वरूप चोल साम्राज्य की नींव हिल गई। परांतक प्रथम के बाद के 32 वर्षों में अनेक चोल राजाओं ने शासन किया। इनमें गंडरादित्य, अरिंजय और सुंदर चोल या परातक दि्वतीय प्रमुख थे। साम्राज्य का अभ्युदय नौवीं शताब्दी में हुआ और दक्षिण प्राय:द्वीप का अधिकांश भाग इसके अधिकार में था। चोल शासकों ने श्रीलंका पर भी विजय प्राप्त कर ली थी और मालदीव द्वीपों पर भी इनका अधिकार था। कुछ समय तक इनका प्रभाव कलिंग और तुंगभद्र दोआब पर भी छाया था। इनके पास शक्तिशाली नौसेना थी और ये दक्षिण पूर्वी एशिया में अपना प्रभाव क़ायम करने में सफल हो सके। चोल साम्राज्य दक्षिण भारत का निःसन्देह सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था। अपनी प्रारम्भिक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने के बाद क़रीब दो शताब्दियों तक अर्थात् बारहवीं ईस्वी के मध्य तक चोल शासकों ने न केवल एक स्थिर प्रशासन दिया, वरन् कला और साहित्य को बहुत प्रोत्साहन दिया। कुछ इतिहासकारों का मत है कि चोल काल दक्षिण भारत का 'स्वर्ण युग' था। चोल साम्राज्य की स्थापना चोल साम्राज्य की स्थापना विजयालय ने की, जो आरम्भ में पल्लवों का एक सामंती सरदार था। उसने 850 ई. में तंजौर को अपने अधिकार में कर लिया और पाण्ड्य राज्य पर चढ़ाई कर दी। चोल 897 तक इतने शक्तिशाली हो गए थे कि, उन्होंने पल्लव शासक को हराकर उसकी हत्या कर दी और सारे टौंड मंडल पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद पल्लव, इतिहास के पन्नों से विलीन हो गए, पर चोल शासकों को राष्ट्रकूटों के विरुद्ध भयानक संघर्ष करना पड़ा। राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय ने 949 ई. में चोल सम्राट परान्तक प्रथम को पराजित किया और चोल साम्राज्य के उत्तरी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। इससे चोल वंश को धक्का लगा, लेकिन 965 ई. में कृष्ण तृतीय की मृत्यु और राष्ट्रकूटों के पतन के बाद वे एक बार फिर उठ खड़े हुए। चोल साम्राज्य का उत्थान छठी शताब्दी के मध्य के बाद दक्षिण भारत में पल्लवों, चालुक्यों तथा पाण्ड्य वंशों का राज्य रहा। पल्लवों की राजधानी कांची, चालुक्यों की बादामी तथा पाण्ड्यों की राजधानी मदुरई थी, जो आधुनिक तंजौर में है और दक्षिण अर्थात् केरल में, चेर शासक थे। कर्नाटक क्षेत्र में कदम्ब तथा गंगवंशों का शासन था। इस युग के अधिकतर समय में गंग शासक राष्ट्रकूटों के अधीन थे या उनसे मिलते हुए थे। राष्ट्रकूट इस समय महाराष्ट्र क्षेत्र में सबसे अधिक प्रभावशाली थे। पल्लव, पाण्ड्य तथा चेर आपस में तथा मिलकर राष्ट्रकूटों के विरुद्ध संघर्षरत थे। इनमें से कुछ शासकों विशेषकर पल्लवों के पास शक्तिशाली नौसेनाएँ भी थीं। पल्लवों के दक्षिण पूर्व एशिया के साथ बड़े पैमाने पर व्यापारिक सम्बन्ध थे और उन्होंने व्यापार तथा सांस्कृतिक सम्बन्धों को बढ़ाने के लिए कई राजदूत भी चीन भेजे। पल्लव अधिकतर शैव मत के अनुयायी थे और इन्होंने आधुनिक चेन्नई के निकट महाबलीपुरम में कई मन्दिरों का निर्माण किया। राजराज का काल चोल वंश के सबसे शक्तिशाली राजा राजराज (985-1014 ई.) तथा उसका पुत्र राजेन्द्र प्रथम (1012-1044 ई.) थे। राजराज को उसके पिता ने अपने जीवन काल में ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था और सिंहासन पर बैठने के पहले ही उसने प्रशासन तथा युद्ध-कौशल में दक्षता प्राप्त कर ली थी। राजराज ने सबसे पहले अपना ध्यान पाण्ड्य तथा चेर शासकों तथा उनके मित्र श्रीलंका के शासक की ओर दिया। उसने त्रिवेन्द्रम के निकट चेर की नौसेना को नष्ट किया तथा कुइलान पर धावा बोल दिया। उसके बाद उसने मदुरई तक विजय प्राप्त की और पाण्ड्य शासक को अपना बंदी बना लिया। उसने श्रीलंका पर भी आक्रमण किया और उस द्वीप के उत्तरी हिस्से को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया। ये क़दम उसने इसलिए उठाया क्योंकि वह दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से होने वाले व्यापार को अपनी मुट्ठी में रखना चाहता था। उन दिनों कोरो मंडल तट तथा मालाबार, भारत तथा दक्षिण पूर्व एशिया के बीच होने वाले व्यापार के केन्द्र थे। राजराज ने मालदीव द्वीपों पर भी चढ़ाई की। उत्तर में राजराज ने गंग प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों को भी अपने अधिकार में ले लिया तथा वेंगी को भी विजित कर लिया। राजेंद्र प्रथम का काल राजेन्द्र प्रथम ने राज के विस्तार की नीति को अपनाया और पाण्ड्य चेर देशों पर विजय प्राप्त कर उन्हें अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसने श्रीलंका पर भी पूर्ण विजय प्राप्त की और एक युद्ध में श्रीलंका के राजा और रानी के मुकुटों और राज चिह्नों को अपने अधिकार में ले लिया। अगले पचास वर्षों तक श्रीलंका चोल शासकों के नियंत्रण से मुक्त न हो सका। राजराज तथा शैलेन्द्र प्रथम ने विभिन्न जगहों पर शिव तथा विष्णु के मन्दिरों का निर्माण कर अपने विजय के प्रमाण दिए। इनमें से सबसे प्रसिद्ध तंजावुर का राजराजेश्वर मन्दिर है जिसका निर्माण कार्य 1010 ई. में पूरा हुआ। चोल शासकों ने इन मन्दिरों की दीवारों पर अपनी विजय के बड़े-बड़े अभिलेख खुदवाए। इन्हीं से हमें चोल शासकों और उनके पूर्वजों के बारे में बहुत कुछ पता लगता है। राजेन्द्र प्रथम का एक प्रमुख अभियान वह था जिसमें वह कलिंग होता हुआ बंगाल पहुँचा जहाँ उसकी सेना ने दो नरेशों को पराजित किया। इस अभियान का नेतृत्व 1022 ई. में एक चोल सेनाध्यक्ष ने किया और उसने वही मार्ग अपनाया जो महान् विजेता समुद्रगुप्त ने अपनाया था। इस अभियान की सफलता की प्रशस्ति में राजेन्द्र प्रथम ने 'गंगई कौंडचोल' (अर्थात् गंगा का चोल विजेता) की पदवी ग्रहण की। उसने कावेरी के तट पर एक नयी राजधानी 'गंगाईकोंड चोलपुरम्' (गंगा के चोल विजेता का शहर) का निर्माण किया। राजेन्द्र प्रथम का एक और मुख्य अभियान शैलेन्द्र साम्राज्य के विरुद्ध नौ सैनिक अभियान था। शैलेन्द्र साम्राज्य का आठवीं शताब्दी में उदय हुआ था और मलाया प्रायद्वीप, सुमात्रा, जावा तथा उसके निकट के द्वीपों पर इसका अधिकार था। चीन के साथ सड़क के रास्ते होने वाले व्यापार पर भी इसका नियंत्रण था। शैलेन्द्र वंश के शासक बौद्ध थे, चोलों के साथ इनके बड़े अच्छे सम्बन्ध थे। शैलेन्द्र शासक ने नागपट्टम में एक बौद्ध मठ का निर्माण किया था और उसके अनुरोध पर राजेन्द्र प्रथम ने मठ के खर्च के लिए एक ग्राम का अनुदान दिया था। इन दोनों के बीच सम्बन्ध टूटने का कारण यह था कि चोल शासक भारतीय व्यापार में पड़ने वाली बाधाओं को हटाना चाहते थे। इस अभियान से उन्हें कादरम या केदार तथा मलाया प्राय:द्वीप और सुमात्रा में कई स्थानों पर विजय मिली। कुछ समय तक इस क्षेत्र में चोलों की नौसेना सबसे अधिक शक्तिशाली थी तथा बंगाल की खाड़ी चोलों की झील के समान हो गई थी। चोल शासकों ने अपने कई दूत चीन भी भेजे। सत्तर व्यापारियों का एक मंडल 1077 ई. में चोल दूतों के रूप में चीन गया और वहाँ उसे 81,800 कांस्य मुद्राओं की माला मिली, अर्थात् यह संख्या उतनी ही थी, जितनी उन व्यापारियों की वस्तुएँ थीं, जिसमें कपूर, कढ़ाई किए कपड़े, हाथी दांत, गैंडों के सींग तथा शीशे का सामान था। चोल सम्राटों ने राष्ट्रकूटों के उत्तराधिकारी चालुक्यों से बराबर संघर्ष किया। इन्हें उत्तरकालीन चालुक्य कहा जाता है और इनकी राजधानी कल्याणी में थी। चोल और चालुक्यों में वेंगी (रायलसीमा), तुंगभद्र और कर्नाटक के उत्तर-पश्चिम में गंगों के क्षेत्र पर प्रभुत्व के लिए संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में किसी भी पक्ष की निश्चित रूप से विजय नहीं हुई और दोनों पक्ष अन्ततः कमज़ोर पड़ गए। ऐसा लगता है कि इस युग में युद्ध की भयंकरता बढ़ती गई। चोल शासकों ने चालुक्यों के शहरों को, जिनमें कल्याणी शामिल था, तहस-नहस कर डाला और जनता का, जिसमें ब्राह्मण और बच्चे शामिल थे, क़त्लेआम किया। यही नीति उन्होंने पाड्य राजाओं के साथ अपनाई। उन्होंने श्रीलंका की प्राचीन राजधानी अनुराधापुर को भी धराशायी कर दिया और वहाँ के राजा और रानी के साथ बड़ी कठोरता का व्यवहार किया। ये कार्य चोल साम्राज्य के इतिहास पर कलंक हैं। लेकिन इसके बावजूद चोल किसी भी देश पर विजय प्राप्त कर लेते थे, तो उसमें ठोस शासन व्यवस्था क़ायम करते थे। चोल-प्रशासन की एक प्रमुख बात यह थी कि, वे अपने सारे साम्राज्य के ग्रामों में स्वशासन को प्रोत्साहित करते थे। चोल बारहवीं शताब्दी तक समृद्धशाली बने रहे, लेकिन तेरहवीं शताब्दी के आरम्भ में उनका पतन शुरू हो गया। बारहवीं शताब्दी तक महाराष्ट्र में उत्तर कालीन चालुक्यों की शक्ति भी क्षीण पड़ गई थी। चोल साम्राज्य की जगह अब दक्षिण में पाण्ड्य तथा होयसल सम्राटों तथा उत्तरकालीन चोल सम्राटों की जगह यादव और काकतीय सम्राटों ने ले ली थी। इन राज्यों ने भी कला तथा स्थापत्य को बढ़ावा दिया। दुर्भाग्यवश उन्होंने आपस में संघर्ष कर स्वयं को कमज़ोर बना लिया। इन्होंने एक दूसरे के नगरों का विध्वंस किया और यहाँ तक की मन्दिरों को भी नहीं छोड़ा। अन्ततः चौदहवीं शताब्दी के आरम्भ में दिल्ली के सुल्तानों ने इनको जड़ से उखाड़ दिया। चोल प्रशासन चोल प्रशासन में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पद राजा का होता था। चोल कालीन शासन व्यवस्था राजतंत्रात्मक थी। राजा का पद वंशानुगत व्यवस्था पर आधारित था। राजा के लिए एक मंत्रिपरिषद की व्यवथा थी। राजकीय आदेशों का क्रियान्वयन 'ओलै' नाम के अतिविशिष्ट अधिकारी किया करते थे। राजा के प्रधान सचित को 'औलनायमकम' कहा जाता था। चोल प्रशासन में भाग लेने वाले उच्च पदाधिकारियों को 'पेरुन्दनम्' एवं निम्न श्रेणी के पदाधिकारियों को 'शेरुन्दनम्' कहा जाता था। इस समय अधिकारियों के वेतन का भुगतान पकद रूप में न करके भूमि के रूप में किया जाता था। 'विडैयाधिकारिन' नाम का अधिकारी कार्य प्रेषक किराने के रूप में कार्य करता था। राज्य के उच्च अधिकारियों (मंत्रियों) को 'उडनकुट्टम्' कहा जाता था। प्रशासकीय इकाइयाँ प्रशासन की सुविधा हेतु सम्पूर्ण चोल साम्राज्य 6 प्रान्तों में विभक्त था। प्रान्तों को 'मण्डलम्' कहा जाता था। प्रायः राजकुमारों को यहां का प्रशासन देखना पड़ता था। मण्डलम् को कोट्टम (कमिश्नरी) में, कोट्टम को नाडु (ज़िले) में एवं प्रत्येक नाडु को कई कुर्रमों (ग्राम समूह) में विभक्त किया गया था। बड़े-बड़े शहर या गांव एक अलग कुर्रम बन जाते थे और तनियूर या तंकुरम कहलाते थे। मण्डलम् से लेकर ग्राम स्तर तक के प्रशासन हेतु स्थानीय सभाओं का सहयोग लिया जाता था। 'नाडु' की स्थानीय सभा को 'नाटूर' एवं नगर की सभाओं को क्रमशः श्रेणी और पूग कहा जाता था। चोल सम्राट परान्तक प्रथम के शासन के 12वें एवं 14वें वर्ष के प्रसिद्व 'उत्तरमेरूर अभिलेखों' में चोल कालीन स्थानीय स्वशासन एवं ग्राम प्रशासन व्यवस्था का साक्ष्य मिलता है। स्थानीय स्वशासन चोल शासन प्रणाली की महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। स्थानीय स्वशासन में 'उर' तथा 'सभा' व महासभा के सदस्य वयस्क होते थे। उर सर्वसाधारण लोगों की समिति थी, जिसका कार्य होता था- सार्वजनिक कल्याण के लिए तालाबों व बगीचों के निर्माण हेतु गांव की भूमि का अधिग्रहण करना। सभा या ग्राम सभा यह मूलतः अग्रहारों व ब्राह्मणों बस्तियों की संस्था थी। इसके सदस्यों को 'पेरुमक्कल' कहा जाता था। 'वारियम' (कार्यकारिणी समिति) की सदस्यता हेतु 35 से 70 वर्ष के बीच तक के व्यक्तियों को अवसर दिया जाता था। इसके अतिरिक्त वह कम से कम डेढ़ एकड़ भूमि का मालिक एवं वैदिक मंत्रों का ज्ञाता हो। इन अर्हताओं को पूरा करके चुने गये 30 सदस्यों में से 12 ज्ञानी व्यक्तियों को वार्षिक समिति 'सम्वत्सर वारियम्' के लिए चुना जाता था और शेष बचे 18 सदस्यों में 12 उद्यान समिति के लिए एवं 6 को तड़ाग समिति के लिए चुना जाता था। सभी की बैठक गांव में मन्दिर के वृक्ष के नीचे एवं तालाब के किनारे होती थी। महासभा को 'पूरुगर्रि', इसके सदस्यों को 'पेरुमक्कल' एवं समिति के सदस्यों को 'वारियप्पेरुमक्कल' कहा जाता था। व्यापारियों की सभा को 'नगरम्' कहा जाता था। नगरों में व्यापारियों के विभिन्न संगठन थे, जैसे- मणिग्राम, वलंजीयर आदि। चोल काल के 'उर' का रूप लघुगणतंत्र जैसा था। इस समय सार्वजनिक भूमि महासभा के अधिकार क्षेत्र में होती थी। महासभा ग्रामवासियों पर कर लगाने, उसे वसूलने एवं बेगार लेने का भी अधिकार अपने पास रखती थी। सभा या महासभा वर्ष में एक बार केन्द्रीय सरकार को कर देती थी। महासभा की आय और व्यय का निरीक्षण केन्द्र सरकार के अधिकारी किया करते थे। केन्द्र सरकार असामान्य स्थितियों में ही ग्रामसभा के स्वायत्त शासन में हस्तक्षेप करती थी। आय का स्रोत ------------ चोल कालीन अन्य कर आयम राजस्व कर मरमज्जाडि वृक्ष कर कडमै सुपारी पर कर मनैइरै गृह कर कढै़इरै व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर लगने वाला कर पेविर तेलघानी कर किडाक्काशु नर पशुधन कर कडिमै लगान पाडिकावल ग्राम सुरक्षा कर वाशल्पिरमम द्वार कर मगन्मै व्यवसाय कर आजीवक्काशु आजीविका पर लगने वाला कर राज्य की आय का मुख्य साधन भूराजस्व था। भूराजस्व निर्धारित करने से पूर्व भूमि का सर्वेक्षण, वर्गीकरण एवं नाप-जोख कराई जाती थी। तत्कालीन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि, राजराज प्रथम एवं कुलोत्तुंग के पैर की माप ही भूमि की लम्बाई मापने की इकाई बनी। भूमिकर भूमि की उर्वरता एवं वार्षिक फ़सल चक्र देखने के बाद निर्धारित किया जाता था। सम्भवतः चोल काल में भूमि कर उपज का एक तिहाई हुआ करता था, जिसे अन्न व नक़द दोनों रूपों में लिया जाता था। चोल अभिलेखों में भूमि कर के अतिरिक्त अन्य करों का उल्लेख मिलता है। राजस्व विभाग का उच्च अधिकारी 'वरित्पोत्तगकक्' कहा जाता था। इन करों के अतिरिक्त् चोल राजा निकटवर्ती क्षेत्रों की लूट मार से भी अपनी आय बढ़ाते थे। विवाह समारोह पर भी कर लगता था। अभिलेखों में करो व वसूलियों के लिए 'हरै' या 'वरि', 'मरुन्पाडु' और 'द्रंडम्' शब्द का प्रयोग किया गया है। अन्न का मान एक कलम (तीन मन) था। बेलि भूमि माप की इकाई थी। सोने के सिक्के को काशु कहा जाता था। चोल अभिलेखों में भूमि कर के अतिरिक्त अनेक प्रकार के कर लगाए जाते थे, जैसे- मरमज्जाडि (उपयोगी वृक्षकर), कडमै (सुपाड़ी के बाग़ान पर कर), मनैइरै (गृहकर), कढ़ैइरै (व्यापारिक प्रतिष्ठान कर), पेविर (तेलघानी कर), पाडिकावल (ग्राम सुरक्षा कर), मगन्यै (स्वर्णकार, लौहकार, कुम्भकार, बढ़ई आदि के पेशों पर लगाया जाने वाला कर)। सैन्य संगठन चोलों की स्थायी सेना में पैदल, गजारोही, अश्वारोही आदि सैनिक शामिल होते थे। इनके पास एक बड़ी नौसेना थी, जो राजराज प्रथम एवं राजेन्द्र प्रथम के समय में चरमोत्कर्ष पर थी। बंगाल की खाड़ी चोलों की नौसेना के कारण ही 'चोलों की झील' बन गई। 'बड़पेर्र कैककोलस' राजा की व्यक्तिगत सुरक्षा में तैनात पैदल दल को कहते थे, जबकि 'कुंजिर-मल्लर' गजारोही दल को, 'कुदिरैच्चैवगर' अश्वारोही दल को, 'बिल्लिगल' धनुर्धारी दल को, 'कैककोलस' पैदल सेना में सर्वाधिक शक्तिशाली को, 'सैगुन्दर' भाला से प्रहार करने में निपुण सैनिकों को एवं 'वेलैक्कार' राजा की अतिविश्वसनीय अंगरक्षक को कहते थे। सेना गुल्मों व छावनियों (कडगम) में रहती थी। चोल काल में सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करने वाले को नायक तथा सेनाध्यक्ष को महादण्डनायक कहा जाता था। सेना में अनेक सेनापति ब्राह्मण थे, जिन्हें ब्रह्माधिराज कहा जाता था। न्याय व्यवस्था राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। चोल अभिलेखों में राजा के धर्मासन का अंतिम न्याय प्राप्त करने के रूप में उल्लेख है, जहाँ पर राजा धर्मासनभट्ट (स्मृतिशास्त्र ज्ञाता, ब्राह्मण एवं विद्वान) की सहायता से न्याय करता था। छोटे विवादों पर स्थानीय निगम निर्णय देते थे। चोलों की दण्ड व्यवस्था में आर्थिक दण्ड एवं सामाजिक अपमान का दण्ड दिया जाता था। प्रायः आर्थिक दण्ड काशु (मुद्रा) में दिया जाता था। चोलकालीन समाज चोलों के समय जाति व्यवस्था के अन्तर्गत ब्राह्मण एवं 'वेल्लाल' (शूद्र वर्ग के बड़े भूस्वामी) का स्थान सर्वोच्च था। ब्राह्मणों को दी गयी कर मुक्त भूमि को 'चतुर्वेदि मंगलम्' कहते थे। इसके अतिरिक्त कुछ विशेष अधिकार प्राप्त वर्गो में 'बलंगै' के पास विशेष अधिकार होते थे। चोल काल में क्षत्रिय एवं वैश्य वर्ग का अस्तित्व नहीं था। चोल समाज में कुछ वर्गों को अछूत (परैया) माना जाता था। वेल्लाल शूद्र कृषक थे। चोल काल में उच्च वर्ग के पुरुषों तथा निम्न वर्ग की महिलाओं से रथराज नामक एक नये वर्ग का उदय हुआ। चोल काल में स्त्रियों की स्थिति पूर्वकाल की तुलना में बेहतर थी। उच्च कुल की स्त्रियां प्रशासन से संबद्ध थीं, किन्तु सती प्रथा एवं देवदासी प्रथा जैसी कुरीतियां भी विद्यमान थीं। दास प्रथा का भी प्रचलन था। धार्मिक स्थिति चोलों के समय में वैष्णव धर्म एवं शैव धर्म व्यापक प्रचार हुआ। दक्षिण में इनके मतों के प्रचार में शैव-नायनारों एवं वैष्णव-आलवारों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अधिकतर चोल शासक कट्टर शैव थे। उन्होंने शैव धर्म के प्रचार-प्रसार में गहरी रुचि ली। चोल नरेश आदित्य (चोल वंश) ने शिव पूजा के लिए कावेरी नदी के किनारे शिव मंदिर का निर्माण और इसके पुत्र परान्तक प्रथम ने इन्हीं की अराधना में 'दभ्रसभा' का निर्माण करवाया। चोल सम्राट राजराज प्रथम के काल में तो शैव धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया। राजराज ने तंजौर में'‘राराजेश्वर' अथवा 'बृहदीश्वर' मंदिर का निर्माण करवाया, साथ ही 'शिवपादशेखर' की उपाधि भी धारण की। राजराज के समय शैव सन्त 'नम्बिआण्डारनम्बि' ने शैव मंत्रों को धर्मग्रंथ में संग्रहीत किया। चोल काल में वैष्णव मत के प्रसिद्ध आचार्य रामानुजाचार्य थे। उन्होंने विशिष्टाद्वैत मत का प्रतिपादन किया। उन्होंने कुलोत्तुंग द्वितीय द्वारा चिदम्बरम् मंदिर से गोविन्दराज विष्णु की मूर्ति को समुद्र में फेंक देने के बाद उसे तिम्पति के विशाल वैष्णव मंदिर में स्थापित करवाया। साहित्य चोल राजाओं के समय में तमिल भाषा एवं साहित्य का विकास हुआ। तमिल कवियों में प्रसिद्ध 'जयन्गोन्दार' कुलोत्तुंग प्रथम का राजकवि था। उसने 'कलिगुत्तिपुराण' नाम के ग्रंथ की रचना कीं कुलोत्तुंग तृतीय के दरबार में रहने वाले कवि कंबन का काल तमिल साहित्य का स्वर्ण काल माना जाता है। इस काल की अन्य रचनायें शेक्किल्लार द्वारा विरचित 'पेरिय पुराणम्', पुलगेन्दि की नलबेम्बा तथा तिरूक्तदेवर की 'जीवक चिन्तामणि' है। कुलोत्तुंग द्वितीय (1130-50) के शासनकाल में शेक्किलार ने तिरुतोण्डार पुराणम् यो परियपुराणम् लिखा है। यह तमिल शैव साहित्य में एक बहुत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। प्रियपूर्णम या शेखर की 'तिरूटोण्डपूर्णम्' को पांचवा वेद कहा जाता है। मामूलनार प्रमुख प्राचीन तमिल कवि थे, जिन्होंने अपनी रचना में नन्द वंश एवं मौर्य वंश का उल्लेख किया है। इस काल के अन्य धार्मिक ग्रन्थों में नन्दी का 'तिरुविलाईयादल पूर्णम्' नम्बि, आंडारनम्बि का 'तिरुमुलाई-कांडपूर्णम्' तथा अमुदनार का 'रामानुज नुरदादि' हैं। तमिल काव्य में आगम वर्ग की कविताएं भगवान शिव की प्रशंसा में लिखी गयी हैं। सांस्कृतिक जीवन चोल साम्राज्य के विस्तार और उसके वैभव से उसके शासकों के लिए तंजौर, गंगईकोंडचोलपुरम, कांची जैसे बड़े नगरों का निर्माण सम्भव हो सका। शासकों ने अपने लिए बड़े-बड़े महल, जो बाग़ानों से सुसज्जित थे, बनवाए। चोल शासकों ने पाँच और सात मंज़िली इमारतें बनवायीं और उनके सरदारों के पास तीन से पाँच मंज़िले महल थे। दुर्भाग्यवश उस काल की एक भी इमारत ऐसी नहीं बची है। चोलों की राजधानी गंगईकोंडचोलपुरम अब तंजौर के निकट एक छोटा सा गाँव मात्र है। लेकिन इस युग के साहित्य से हमें चोल शासकों और उनके मंत्रियों तथा बड़े व्यापारियों के विशाल महलों और उनके वैभव के बारे में पता चलता है। मन्दिर स्थापत्य कला चोल सम्राटों के युग में दक्षिण भारत में मन्दिर स्थापत्य अपने शिखर पर था। इनके समय मन्दिर स्थापत्य में एक नयी शैली का विकास हुआ। इस शैली को 'द्रविड़' कहते हैं। क्योंकि यह अधिकांश दक्षिण भारत में सीमित थी। इसकी प्रमुख विशेषता यह थी कि, गर्भगृह, अर्थात् प्रतिमा कक्ष के ऊपर एक के बाद एक कर पाँच से सात मंज़िलों तक का निर्माण होता था। हर मंज़िल एक विशेष शैली में निर्मित होती थी जिसे 'विमान' कहते थे। प्रतिमा कक्ष के सामने खम्बों वाला और सपाट छत का एक विशाल हौल था, जिसे 'मंडप' के नाम से जाना जाता था। इसके खम्बों पर बारीक खुदाई होती थी। मंडप में विशेष अवसरों पर सभाएँ होती थीं और 'देवदासियों' का नृत्य होता था। देवदासियाँ ऐसी स्त्रियों को कहते थे, जिन्हें देवताओं की सेवा के लिए अर्पित कर दिया जाता था। कभी-कभी प्रतिमा कक्ष के चारों ओर एक गलियारा होता था। ताकि भक्त लोग प्रतिमा की परिक्रमा कर सकें। इस गलियारे में भी कई देवी-देवताओं की मूर्तियाँ होती थीं। मंडप तथा प्रतिमा कक्ष एक ऊँची दीवारों वाले बहुत बड़े प्रांगण से घिरा रहता था, जिसमें प्रवेश के लिए बड़े-बड़े दरवाज़े थे जो 'गोपुरम्' के नाम से जाने जाते थे। समय के साथ विमानों को और ऊँचा करने का रिवाज बढ़ता गया, प्रांगणों की संख्या दो या तीन तक बढ़ा दी गई तथा गोपुरम् और अधिक भव्य होते गए। इस प्रकार मन्दिरों ने छोटे-मोटे महल अथवा शहरों का रूप धारण कर लिया। जिसमें पुरोहित तथा मन्दिर से सम्बन्धित अन्य लोग रहते थे। मन्दिरों को खर्चे के लिए कर-मुक्त भूमि का अनुदान दिया जाता था। इसके अलावा धनी व्यापारी भी इन्हें दान देते थे। कुछ मन्दिरों के पास तो इतनी सम्पत्ति हो गई कि, वे भी व्यापार और ऋण देने का काम करने लगे। द्रविड़ शैली के आरम्भ के काल के मन्दिर स्थापत्य का उदाहरण हमें कांची में कैलाशनाथार मंदिर में मिलता है। इसका उत्कृष्ट उदाहरण हमें तंजावुर में राजराज प्रथम द्वारा निर्मित 'बृहदीश्वर मन्दिर' में मिलता है। इसे राजराज मन्दिर कह कर पुकारा जाता है। क्योंकि चोल सम्राट मन्दिरों में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के अलावा अपनी तथा रानियों की मूर्तियाँ भी प्रतिष्ठापित करते थे। गंगाईकोंडाचोलापुरम् के मन्दिर में भी, यद्यपि यह टूटी-फूटी स्थिति में है, हमें चोल सम्राटों के काल के मन्दिर स्थापत्य शैली का अच्छा उदाहरण देखने को मिलता है। दक्षिण भारत के अन्य जगहों में भी बड़ी संख्या में मन्दिरों का निर्माण कराया गया। लेकिन चोल सम्राटों ने ऐसे कार्यों को पड़ोसी राज्यों की जनता को लूटकर किया। चोलों के पतन के बाद चालुक्यों और होयसलों ने मन्दिर निर्माण का काम जारी रखा। धारवार ज़िले तथा होयसलों की राजधानी 'हेलेबिड' में कई मन्दिर हैं। इनमें सबसे भव्य 'होयसलेश्वर मन्दिर' है। चालुक्य शैली का यह सबसे अच्छा उदाहरण है। मन्दिर में देवी-देवताओं और उनके परिचारकों, यक्ष और यक्षिणी की मूर्तियों के अलावा ऐसे चित्रपट्ट हैं जिन पर जीवन के विभिन्न पहलुओं, जैसे नृत्य कला, संगीत, युद्ध और प्रणय के दृश्य तराशे हुए हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि जीवन और धर्म में बहुत गहरा सम्बन्ध था। आम आदमी के लिए मन्दिर मात्र पूजा का स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी केन्द्र था। इस युग में दक्षिण भारत में वास्तु कला भी बड़ी विकसित थी। इसका एक उदाहरण हमें श्रावण बेलगोला में 'गोमतेश्वर' की विशाल प्रतिमा में मिलता है। इस युग में प्रतिमा गढ़ने की कला भी अपने शिखर पर थी, जैसा कि हम नृत्य की मुद्रा में शिव, नटराज, की प्रतिमा में देखते हैं। इस काल की नटराज की प्रतिमाएँ, विशेषकर जो कांस्य में गढ़ी गई हैं, इस काल की उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ये मूर्तियाँ भारतीय तथा विदेशी संग्रहालयों की शोभा हैं। चोल साम्राज्य का पतन चोल साम्राज्य के अंतिम शासक कुलोत्तुंग द्वितीय के उत्तराधिकारी निर्बल थे। वे अपने राज्य को अक्षुण्ण बना रखने में असफल रहे। सुदूर दक्षिण में पाण्ड्य, केरल और सिंहल (श्रीलंका) राज्यों में विद्रोह की प्रवृत्ति बहुत बढ़ गई थी और वे चोलों की अधीनता से मुक्त हो गए। समुद्र पार के जिन द्वीपों व प्रदेशों पर राजेन्द्र प्रथम द्वारा आधिपत्य स्थापित किया गया था, उन्होंने भी अब स्वतंत्रता प्राप्त कर ली। द्वारसमुद्र के होयसाल और इसी प्रकार के अन्य राजवंशों के उत्कर्ष के कारण चोल राज्य अब सर्वथा क्षीण हो गया। चोलों के अनेक सामन्त इस समय निरन्तर विद्रोह के लिए तत्पर रहते थे, और चोल राजवंश के अन्तःपुर व राजदरबार भी षड़यत्रों के अड्डे बने हुए थे। इस स्थिति में चोल राजाओं की स्थिति सर्वथा नगण्य हो गई थी। चोल पल्लव के सामंत थे। पल्लव वंश के ध्वंसावसेसो पर चोल वंश की नींव रखी गयी थी।
प्रधानमंत्री योजना
प्रधानमंत्री द्वारा शुरू की महत्वपूर्ण योजनाएं।🐾 ● जन धन योजना : 28 अगस्त 2014, सभी परिवारों की बैंक खाते तक पहुंच| ● मेक इन इंडिया : 25 सितंबर 2014, देश में मैनुफैक्चरिंग को बढ़ावा ● स्वच्छ भारत मिशन : 2 अक्टूबर 2014, 2 अक्टूबर 2019 तक देश को एक स्वच्छ भारत के रुप में प्रस्तुत करना| ● राष्ट्रीय आयु मिशन : 15 सितंबर 2014, देश की प्रारंभिक चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा ● संसद आदर्श गांव योजना : 11 अक्टूबर 2014, प्रदीप संसद द्वारा 2016 तक 1-1 तथा बाद में 2019 तक 2-2 अन्य गांव का विकास करना ● दीनदयाल उपाध्यक्ष श्रमेव जयते : 16 अक्टूबर 2014, श्रमिकों के लिए विभिन्न पहले ● फास्टैग : 31 अक्टूबर 2014, राष्ट्रीय राजमार्गों पर इलेक्ट्रॉनिक टाल कलेक्शन (ETC) की व्यवस्था ताकि टाल अदायगी के लिए वाहनों को बार-बार रुकना नहीं पड़े ● इंद्रधनुष : 25 दिसंबर 2014, गर्भवती महिलाओं में 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का टीकाकरण ● हृदय योजना : 21 जनवरी 2015, भारत के प्राचीन 12 नगरों के सर्वांगीण विकास एवं ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए ● बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना : 22 जनवरी 2015, (पानीपत हरियाणा से शुरू), लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की संख्या कम होने के कारण बढ़ते लिंगानुपात को कम करने के लिए ● सुकन्या समृद्धि योजना : 22 जनवरी 2015, माता-पिता लड़की के नाम सिर्फ 10 वर्ष से कम आयु में बैंक खाता खोल सकेंगे ● मिशन इंद्रधनुष : 25 दिसंबर 2014, 7 टीका निवारणीय बीमारियों डिप्थीरिया, काली खांसी, टर्मिनस, पोलियो, TV, खसरा और हेपेटाइटिस “बी” का 2020 ऐसे बच्चों का टीकाकरण करना है आंशिक रूप से टीका लगा है या इससे वंचित हैं ● मुद्रा स्वास्थ्य कार्ड योजना : 19 फरवरी 2015 (सूरतगढ़ श्री गंगानगर राज से), पोषक तत्व और उवरको के उचित उपयोग से उत्पादकता में सुधार लाकर किसानों की मदद करना ● प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना : 21 मार्च 2015, परीक्षण प्रदान करके उन्हें कुशल श्रमिक बनाया जा सके ● प्रधानमंत्री मुद्रा योजना : 8 अप्रैल 2015 (नई दिल्ली), असंगठित क्षेत्र के छोटे कारोबारी के लिए वित्त एवं पुनवित्त की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए ● अटल पेंशन योजना : 9 मई 2015, पेंशन के प्रावधान वाली योजना 18 वर्ष से 40 वर्ष आयु वर्ग के लिए ● प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना : 9 मई 2015, जीवन बीमा की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए ₹2 लाख रुपए का बीमा, 18 से 25 वर्ष आयु वर्ग के लिए ● प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना : 9 मई 2015, दुर्घटना की स्थिति मृत्यु या अपंगता के मामले में क्षतिपूर्ति हेतु बीमा योजना (मृत्यु या स्थाई अपंगता ₹2 लाख रुपए, आंशिक अपंगता 1 लाख रुपए 18 से 70 वर्ष आयु वर्ग के लिए ● उस्ताद योजना : 14 मई 2015 (बनारस से), कौशल उन्नयन एवं परीक्षण द्वारा प्रारंभिक कला एवं हस्तशिल्प का विकास करना है ● अमृत योजना : 25 जून 2015, 100000 से अधिक जनसंख्या वाले 500 से अधिक शहरों में पेयजल, सीवेज स्थानीय अदालत शहीद आधारिक संरचना का विकास करना ● स्मार्ट सिटी मिशन : 25 जून 2015, देश भर में 100 स्मार्ट शहरों का विकास किया जा सकता है जहां 24 घंटे बिजली पानी की सुविधा के साथ पूरे शहर में वाई फाई कनेक्शन होगा ● हाउसिंग फॉर आल : 25 जून 2015, शहरी क्षेत्र में सभी पात्र जनों के लिए आवास की सुविधा उपलब्ध कराना ● डिजिटल इंडिया मिशन : 1 जून 2015, सरकारी विभागों को देश की जनता से जोड़ना तथा यह सुनिश्चित करना है कि बिना कागज के उपयोग के सरकारी सेवाएं मांग पर ही इलेक्ट्रॉनिक रूप में आम जनता तक पहुंच सके ● राष्ट्रीय आविष्कार अभियान योजना : 9 जुलाई 2015, स्कूली बच्चों में विज्ञान एवं गणित के प्रति उत्सुकता एवं सजनता विकसित करने तथा इस दिशा में उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए ●स्किल इंडिया मिशन : 15 जुलाई 2015, युवा मानव शक्ति को वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए कौशल एवं योग्यता उपलब्ध कराने के लिए ● दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना : 25 जुलाई 2015, सभी गांवों का विद्यतीकरण, उपभोक्ताओं और किसानों को पर्याप्त बिजली और वितरण नेटवर्क में सुधार करना ● नई मंजिल : 8 अगस्त 2015, अल्प संख्या समुदाय की प्रगति शक्ति करण के संबंध में समग्र दृष्टिकोण एवं अल्पसंख्यक के कल्याण में सुधार लाने के लिए ● सहज योजना : 30 अगस्त 2015, ऑनलाइन एलपीजी कनेक्शन के लिए पंजीकरण कराने के साथ उसका भुगतान करने में सक्षम होना (ऑनलाइन सुविधा) ● श्याम प्रसाद मुखर्जी ग्रामीण मिशन : 16 सितंबर 2015, गांव को स्मार्ट गांव में बदलना, स्थानीय स्तर पर लोगों को रोजगार महानगरों की और पलायन रोकने और ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास को गति देना | ● प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना : 17 सितंबर 2015, खनन प्रभावित क्षेत्रों में विभिन्न विकास तथा कल्याणकारी परियोजनाओं/ कार्यक्रम को लागू करना
29/04/18
सीधे जज बनने वाली देश की महिला
सीधे जज बनने वाली देश की महिला-
*********** *26 अप्रैल 2018* ************ वरिष्ठ अधिवक्ता इंदु मल्होत्रा सुप्रीम कोर्ट में सीधे जज बनने वाली देश की पहली महिला वकील होंगी.
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने लगभग तीन महीने पहले उनका नाम सुप्रीम कोर्ट जज के लिए भेजा था. केंद्र सरकार ने कॉलेजियम की सिफारिश मान ली है.
*वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में जज:* इस समय सुप्रीम कोर्ट में 24 जज हैं जिनमें सिर्फ एक ही महिला जज जस्टिस आर भानुमति हैं. इंदु के पदभार संभालने के बाद से वो दूसरी महिला जज होंगी.
सुप्रीम कोर्ट में अब तक की महिला जज: * *फातिमा बीबी:* सुप्रीम कोर्ट का गठन वर्ष 1950 में हुआ लेकिन वर्ष 1989 में अर्थात् 39 वर्ष बाद एम. फातिमा बीबी सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला न्यायाधीश नियुक्त हुईं.
फातिमा बीबी केरल हाईकोर्ट से सेवानिवृत होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश नियुक्त हुईं थी. वे 29 अप्रैल 1992 को सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत हुईं. बाद में वे तमिलनाडु की राज्यपाल भी नियुक्त हुईं.
*सुजाता वी मनोहर:* सुप्रीम कोर्ट में दूसरी महिला न्यायाधीश सुजाता वी मनोहर रहीं. सुजाता वी मनोहर सुप्रीम कोर्ट में 8 नवंबर 1994 से 27 अगस्त 1999 तक न्यायाधीश रहीं. उनकी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई में हुई. तत्पश्चात एल्फिंस्टन कॉलेज, मुंबई से स्नातक करने के बाद लेडी मार्गरेट हॉल, ऑक्सफोर्ड, ब्रिटेन चली गईं जहां उन्होने दर्शन शास्त्र, राजनीति शस्त्र और अर्थशास्त्र की पढ़ाई की.
* *रूमा पाल:* इसके बाद जस्टिस रूमा पाल सुप्रीम कोर्ट की महिला न्यायाधीश बनीं. वे 28 जनवरी 2000 से लेकर 2 जून 2006 तक सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश रहीं. रूमा पाल ने विश्व-भारती विश्वविद्यालय से स्नातक, नागपुर विश्वविद्यालय से एलएलबी तथा ऑक्सफोर्ड से बैचलर ऑफसिविल लॉ की उपाधि लेने के बाद, वर्ष 1948 में कोलकाता उच्च न्यायालय में वकालत आरंभ किया.
* *ज्ञान सुधा मिश्रा:* झारखंड हाईकोर्ट की तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा 30 अप्रैल 2010 को सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश नियुक्त हुईं तथा 27 अप्रैल 2014 को सेवानिवृत हुईं. वे झारखण्ड उच्च न्यायालय की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकी हैं. उनके पिता न्यायमूर्ति सतीश चन्द्र मिश्र पटना उच्च न्यायालय के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश थे.
* *रंजना प्रकाश देसाई:* इसी दौरान जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बनीं. जस्टिस देसाई 13 सितंबर 2011 से लेकर 29 अक्टूबर 2014 तक सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश रहीं. वे वर्ष 1970 में एल्फिंस्टन कॉलेज मुंबई से कला में स्नातक और वर्ष 1973 में गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, मुंबई से कानून में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की. वे 30 जुलाई 1973 को कानूनी पेशे में शामिल हो गयी. उन्हें वर्ष 1979 में सरकारी अधिवक्ता के रूप में नियुक्त किया गया था.
* *आर भानुमति:* इसके बाद 13 अगस्त 2014 को जस्टिस आर भानुमति सुप्रीम कोर्ट की महिला न्यायाधीश नियुक्त हुईं. उनकी सेवानिवृति 19 जुलाई 2020 को होगी. जस्टिस आर भानुमति ने 16 नवंबर 2013 को झारखंड हाइकोर्ट की चीफ जस्टिस के रूप मे शपथ ली थी. चीफ जस्टिस आर भानुमति का जन्म 20 जुलाई 1955 को हुआ था. उन्होंने वर्ष 1981 में प्रैक्टिस शुरू की. आर भानुमति को 03 अप्रैल 2003 को मद्रास हाइकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था. ** *एस जयशंकर ने टाटा समूह में बतौर ग्लोबल ऑफिसर ज्वाइन किया* * *इंदु मल्होत्रा:* 01. इंदु मल्होत्रा का जन्म वर्ष 1956 में बेंगलुरु में हुआ था. 02. इनके पिता का नाम ओम प्राकाश मल्होत्रा है और वो भी सुप्रीम कोर्ट में वकील थे. 03. इंदु मल्होत्रा की शुरुआती पढ़ाई कॉर्मल कॉन्वेंट स्कूल से की है. 04. उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस में ग्रैजुएशन और फिर मास्टर डिग्री हासिल की है. वे साल 1983 से ये प्रैक्टिस में हैं. वो कई अहम फैसलों में जजों की पीठ में रही हैं. 05. लॉ करने से पहले इंदु मल्होत्रा ने कुछ दिनों तक मिरांडा हाउस और विवेकानंद कॉलेज में अध्यापन का भी काम किया है. 06. इंदु मल्होत्रा ने पांच साल के अंदर ही सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने के लिए होने वाली परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया था. 07. 26 नवंबर 1988 को इंदु मल्होत्रा को मुकेश गोस्वामी मेमोरियल अवॉर्ड से नवाजा भी जा चुका है.
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